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संपादकीय-10 ()
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हमारे शास्त्रों में संतोष परमं सुखं का मुहावरा आया है। इसलिए विकास की परिभाषा यह है कि विकास वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति और समाज स्थाई सुख-शांति और संतोष का उपयोग करते हैं। वहां प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण नहीं होता बल्कि उनकी वृद्धि होती रहती है। दूसरा जिससे एक व्यक्ति या समूह का लाभ होता है उससे दूसरों की क्षति न हो विकास के कारण समाज में असंतुलन पैदा नहीं होना चाहिए असंतुलन असंतोष की जननी है। इन स्थितियों में आज की भोगवादी सभ्यता को प्राथमिकता बाहुल्य के स्थान पर सादगी और संयम को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। सौभाग्य से भारतीय संस्कृति में सादगी और संयम का पालन करने वाले ही समाज में पूज्य और सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते रहे हैं। महात्मा गांधी ने भारतीय संस्कृति के इस संदर्भ को स्वयं अपने आचरण द्वारा पुनः जीवित कर सारी दुनिया को राह बता दी। उन्होंने कहा प्रकृति के पास हर एक की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त साघन हैं लेकिन किसी एक के भी लोभ लालच को संतुष्ट करने के लिए कुछ नहीं है। निश्चित रूप से, कई वस्तुएं ऐसी होंगी जिनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता इसके विकल्प ढूंढने होंगे। इधर भारत सरकार का नारा है सबका साथ सबका विकास यह नारा जितना लुभावना है उतना ही भ्रामक एवं विडम्बनापूर्ण भी है। यह सही है कि आम आदमी की जरूरत चरम अवस्था में पहुंच चुकी है। हम उन जरूरतों को पूरा करने के लिए विकास की कीमत पर्यावरण के विनाश से चुकाने जा रहे हैं। पर्यावरण का बढ़ता संकट कितना गंभीर हो सकता है इसको नजरअंदाज करते हुए सरकार राजनीतिक लाभ के लिए कोरे विकास की बात कर रही है। जिसमें विनाश की आशंकाएं ज्यादा हैं। विकास और पर्यावरण साथ-साथ चलने चाहिए लेकिन यह चल ही नहीं रहे हैं। इसमें सरकारों के नकारापन के ही संकेत दिखाई देते हैं।जिस तरीके से देश को विकास की ऊंचाई पर खडा करने की बात कही जा रही हैं और इसके लिए औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, उससे तो लगता है कि प्रकृति प्राकृतिक संसाधनों एवं विविधतापूर्ण जीवन का अक्षयकोष कहलाने वाला देश भविष्य में राख का कटोरा बन जाएगा। हरियाली उजड़ती जा रही है और पहाड़ नग्न हो चुके हैं, नदियों का जल सूख रहा है, कृषि भूमि लोहे एवं सीमेन्ट कंकरीट का जंगल बनता जा रहा है। महानगरों के इर्द-गिर्द बहुमंजिल इमारतों एवं शॉपिग मॉल के अम्बार लग रहे हैं उद्योगों को ज़मीन देने से
हमारे शास्त्रों में संतोष परमं सुखं का मुहावरा आया है। इसलिए विकास की परिभाषा यह है कि विकास वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति और समाज स्थाई सुख-शांति और संतोष का उपयोग करते हैं। वहां प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण नहीं होता बल्कि उनकी वृद्धि होती रहती है। दूसरा जिससे एक व्यक्ति या समूह का लाभ होता है उससे दूसरों की क्षति न हो विकास के कारण समाज में असंतुलन पैदा नहीं होना चाहिए असंतुलन असंतोष की जननी है। इन स्थितियों में आज की भोगवादी सभ्यता को प्राथमिकता बाहुल्य के स्थान पर सादगी और संयम को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। सौभाग्य से भारतीय संस्कृति में सादगी और संयम का पालन करने वाले ही समाज में पूज्य और सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते रहे हैं। महात्मा गांधी ने भारतीय संस्कृति के इस संदर्भ को स्वयं अपने आचरण द्वारा पुनः जीवित कर सारी दुनिया को राह बता दी। उन्होंने कहा प्रकृति के पास हर एक की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त साघन हैं लेकिन किसी एक के भी लोभ लालच को संतुष्ट करने के लिए कुछ नहीं है। निश्चित रूप से, कई वस्तुएं ऐसी होंगी जिनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता इसके विकल्प ढूंढने होंगे। इधर भारत सरकार का नारा है सबका साथ सबका विकास यह नारा जितना लुभावना है उतना ही भ्रामक एवं विडम्बनापूर्ण भी है। यह सही है कि आम आदमी की जरूरत चरम अवस्था में पहुंच चुकी है। हम उन जरूरतों को पूरा करने के लिए विकास की कीमत पर्यावरण के विनाश से चुकाने जा रहे हैं। पर्यावरण का बढ़ता संकट कितना गंभीर हो सकता है इसको नजरअंदाज करते हुए सरकार राजनीतिक लाभ के लिए कोरे विकास की बात कर रही है। जिसमें विनाश की आशंकाएं ज्यादा हैं। विकास और पर्यावरण साथ-साथ चलने चाहिए लेकिन यह चल ही नहीं रहे हैं। इसमें सरकारों के नकारापन के ही संकेत दिखाई देते हैं।जिस तरीके से देश को विकास की ऊंचाई पर खडा करने की बात कही जा रही हैं और इसके लिए औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, उससे तो लगता है कि प्रकृति प्राकृतिक संसाधनों एवं विविधतापूर्ण जीवन का अक्षयकोष कहलाने वाला देश भविष्य में राख का कटोरा बन जाएगा। हरियाली उजड़ती जा रही है और पहाड़ नग्न हो चुके हैं, नदियों का जल सूख रहा है, कृषि भूमि लोहे एवं सीमेन्ट कंकरीट का जंगल बनता जा रहा है। महानगरों के इर्द-गिर्द बहुमंजिल इमारतों एवं शॉपिग मॉल के अम्बार लग रहे हैं उद्योगों को ज़मीन देने से
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