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संपादकीय-9 ()
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मनुष्य प्रकृति के साथ अनेक वर्षों से छेड़छाड़ कर रहा है, जिससे पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है। इसे देखने के लिए हमें ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। धरती पर बढ़ रही बंजर भूमि, फैलते रेगिस्तान, जंगलों का विनाश, लुप्त होते पेड़-पौधे और जीव-जन्तु दूषित होता पानी, शहरों में प्रदूषित हवा और हर साल बढ़ते बाढ़ एवं सूखा ग्लोबल वार्मिंग, वैश्विक तापमान वृद्धि, ग्लेशियर पिघलना, ओजोन का क्षतिग्रस्त होना आदि इस बात का सबूत है कि हम धरती और पर्यावरण की सही तरीके से देखभाल नहीं कर रहे।आज पूरे भारत वर्ष में पर्यावरण के सम्मुख गंभीर स्थितियां बनी हुई हैं। प्लास्टिक का उपयोग बहुत ज्यादा बढ़ रहा है। प्लास्टिक के उपयोग से पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान हो रहा है, क्योंकि प्लास्टिक न तो नष्ट होती है और न ही सड़ती है। एक शोध के मुताबिक प्लास्टिक 500 से 700 सालों के बाद नष्ट होना प्रारम्भ होता है। प्लास्टिक को पूरी तरह से नष्ट होने में 1000 साल लग जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि अभी तक जितना भी प्लास्टिक बना वह आज तक नष्ट नहीं हुआ है। मनुष्य जब प्रकृति का स्वामी बन जाता है तो वह उसके साथ कसाई जैसा व्यवहार करने लग जाता है पश्चिम की सभ्यता की उपलब्धियों और उसके आधार पर दुनिया पर उसका आर्थिक साम्राज्य उन देशों के लिए भी अनुकरणीय बन गया जिनकी लूट-खसोट से वे वैभवशाली बने। प्रकृति के भण्डार सीमित हैं और यदि उनका दोहन पुनर्जनन की क्षमता से अधिक मात्रा में किया जाए तो ये भण्डार खाली हो जाएंगे। जल, जंगल और जमीन का एक दूसरे के घनिष्ठ संबंध है। भोगवादी सभ्यता जंगलों को उद्योग व निर्माण सामग्री का भण्डार मानती है। वास्तव में, वन तो जिंदा प्राणियों का एक समुदाय है जिसमें पेड़-पौधे, लताएं कन्द-मूल, पशु-पक्षी और कई जीवधारी शामिल हैं। इनका अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर है। औद्योगिक सभ्यता ने इस समुदाय को नष्ट कर दिया, वन लुप्त हो गए। इसका प्रभाव जल स्त्रोतों पर पड़ा। वन वर्षा की बूंदों की मार अपने हरित कवच के ऊपर झेलकर एक ओर तो मिट्टी का कटाव रोकते हैं और उसका संरक्षण करते हैं। पत्तियों को सड़ाकर नई मिट्टी का निर्माण करते हैं और दूसरी ओर स्पंज की तरह पानी को चूसकर जड़ों में पहुंचाते हैं। वहीं पानी का शुद्धिकरण और संचय करते हैं, फिर धीरे-धीरे इस पानी को छोड़कर नदियों के प्रवाह को सुस्थिर रखते हैं इसलिए मुहावरा बना है कि जंगल नदियों की मां है।
मनुष्य प्रकृति के साथ अनेक वर्षों से छेड़छाड़ कर रहा है, जिससे पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है। इसे देखने के लिए हमें ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। धरती पर बढ़ रही बंजर भूमि, फैलते रेगिस्तान, जंगलों का विनाश, लुप्त होते पेड़-पौधे और जीव-जन्तु दूषित होता पानी, शहरों में प्रदूषित हवा और हर साल बढ़ते बाढ़ एवं सूखा ग्लोबल वार्मिंग, वैश्विक तापमान वृद्धि, ग्लेशियर पिघलना, ओजोन का क्षतिग्रस्त होना आदि इस बात का सबूत है कि हम धरती और पर्यावरण की सही तरीके से देखभाल नहीं कर रहे।आज पूरे भारत वर्ष में पर्यावरण के सम्मुख गंभीर स्थितियां बनी हुई हैं। प्लास्टिक का उपयोग बहुत ज्यादा बढ़ रहा है। प्लास्टिक के उपयोग से पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान हो रहा है, क्योंकि प्लास्टिक न तो नष्ट होती है और न ही सड़ती है। एक शोध के मुताबिक प्लास्टिक 500 से 700 सालों के बाद नष्ट होना प्रारम्भ होता है। प्लास्टिक को पूरी तरह से नष्ट होने में 1000 साल लग जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि अभी तक जितना भी प्लास्टिक बना वह आज तक नष्ट नहीं हुआ है। मनुष्य जब प्रकृति का स्वामी बन जाता है तो वह उसके साथ कसाई जैसा व्यवहार करने लग जाता है पश्चिम की सभ्यता की उपलब्धियों और उसके आधार पर दुनिया पर उसका आर्थिक साम्राज्य उन देशों के लिए भी अनुकरणीय बन गया जिनकी लूट-खसोट से वे वैभवशाली बने। प्रकृति के भण्डार सीमित हैं और यदि उनका दोहन पुनर्जनन की क्षमता से अधिक मात्रा में किया जाए तो ये भण्डार खाली हो जाएंगे। जल, जंगल और जमीन का एक दूसरे के घनिष्ठ संबंध है। भोगवादी सभ्यता जंगलों को उद्योग व निर्माण सामग्री का भण्डार मानती है। वास्तव में, वन तो जिंदा प्राणियों का एक समुदाय है जिसमें पेड़-पौधे, लताएं कन्द-मूल, पशु-पक्षी और कई जीवधारी शामिल हैं। इनका अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर है। औद्योगिक सभ्यता ने इस समुदाय को नष्ट कर दिया, वन लुप्त हो गए। इसका प्रभाव जल स्त्रोतों पर पड़ा। वन वर्षा की बूंदों की मार अपने हरित कवच के ऊपर झेलकर एक ओर तो मिट्टी का कटाव रोकते हैं और उसका संरक्षण करते हैं। पत्तियों को सड़ाकर नई मिट्टी का निर्माण करते हैं और दूसरी ओर स्पंज की तरह पानी को चूसकर जड़ों में पहुंचाते हैं। वहीं पानी का शुद्धिकरण और संचय करते हैं, फिर धीरे-धीरे इस पानी को छोड़कर नदियों के प्रवाह को सुस्थिर रखते हैं इसलिए मुहावरा बना है कि जंगल नदियों की मां है।
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