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संपादकीय-4 ()
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जब से दुनिया शुरू हुई है, तभी से इंसान और कुदरत बीच गहरा रिश्ता रहा है। पेड़ों से पेट भरने के लिए फल-सब्जियां और अनाज मिला। तन ढकने के लिए कपड़ा मिला। घर के लिए लकड़ी मिली। इनसे जीवनदायिनी ऑक्सीजन भी मिलती है। जिसके बिना कोई एक पल भी जिन्दा नहीं रह सकता है। इनसे औषधियां मिलती हैं, पेड इंसान की जरूरत है, उसके जीवन का आधार है। अमूमन सभी मजहबों में पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया गया है। भारतीय समाज में आदिकाल से ही पर्यावरण संरक्षण को महत्त्व दिया गया है। भारतीय संस्कृति में पेड-पौधों को पूजा जाता है। विभिन्न वृक्षों में विभिन्न देवताओं का वास माना जाता है। पीपल, विष्णु और कृष्ण का, वट का वृक्ष ब्रह्मा, विष्णु और कुबेर का माना जाता है जबकि तुलसी का पौधा लक्ष्मी और विष्णु, सोम चंद्रमा का बेल शिव का, अशोक इंद्र का, आम लक्ष्मी का, कदंब कृष्ण का, नीम शीतला और मंसा का, पलाश ब्रह्मा और गंधर्व का, गूलर विष्णु, रूद्र का और तमाल कृष्ण का माना जाता है। इसके अलावा अनेक पौधे ऐसे हैं जो पूजा पाठ में काम आते हैं। जिनमें महुआ और सेमल आदि शामिल हैं। वराह पुराण में वृक्षों का महत्त्व बताते हुए कहा गया है, जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, एक बड़, दस फूल वाले पौधे या बेलें दो अनार, दो नारंगी और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह नरक में नहीं जाएगा।यह हैरत और अफसोस की ही बात है कि जिस देश में, समाज में पेड़-पौधों को पूजने की प्रथा रही है, अब उसी देश में, उसी समाज में पेड़ कम हो रहे हैं। बदलते दौर के साथ लोगों का प्रकृति से रिश्ता टूटने लगा। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए वृक्षों को काटा जा रहा है। नतीजन जंगल खत्म हो रहे हैं। देश में वन क्षेत्रफल 19.2 फीसद है, जो बहुत ही कम है। इससे पर्यावरण के सामने संकट खड़ा हो गया है। घटते वन क्षेत्र को राष्ट्रीय लक्ष्य 33.3 फीसद के स्तर पर लाने के लिए ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाने होंगे। साथ ही खुशनुमा बात यह भी है कि अब जनमानस में पर्यावरण के प्रति जागरूकता आ रही है। लोग अब पेड़-पौधे की अहमियत को समझने लगे हैं। महिलाएं भी इस पुनीत कार्य में बढ़ चढ़कर शिरकत कर रही हैं।बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के गांव मझार कि किरण ने अपने विवाह से पहले एक हजार पौधे लगाए। उन्होंने विवाह की मेहंदी लगाने
जब से दुनिया शुरू हुई है, तभी से इंसान और कुदरत बीच गहरा रिश्ता रहा है। पेड़ों से पेट भरने के लिए फल-सब्जियां और अनाज मिला। तन ढकने के लिए कपड़ा मिला। घर के लिए लकड़ी मिली। इनसे जीवनदायिनी ऑक्सीजन भी मिलती है। जिसके बिना कोई एक पल भी जिन्दा नहीं रह सकता है। इनसे औषधियां मिलती हैं, पेड इंसान की जरूरत है, उसके जीवन का आधार है। अमूमन सभी मजहबों में पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया गया है। भारतीय समाज में आदिकाल से ही पर्यावरण संरक्षण को महत्त्व दिया गया है। भारतीय संस्कृति में पेड-पौधों को पूजा जाता है। विभिन्न वृक्षों में विभिन्न देवताओं का वास माना जाता है। पीपल, विष्णु और कृष्ण का, वट का वृक्ष ब्रह्मा, विष्णु और कुबेर का माना जाता है जबकि तुलसी का पौधा लक्ष्मी और विष्णु, सोम चंद्रमा का बेल शिव का, अशोक इंद्र का, आम लक्ष्मी का, कदंब कृष्ण का, नीम शीतला और मंसा का, पलाश ब्रह्मा और गंधर्व का, गूलर विष्णु, रूद्र का और तमाल कृष्ण का माना जाता है। इसके अलावा अनेक पौधे ऐसे हैं जो पूजा पाठ में काम आते हैं। जिनमें महुआ और सेमल आदि शामिल हैं। वराह पुराण में वृक्षों का महत्त्व बताते हुए कहा गया है, जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, एक बड़, दस फूल वाले पौधे या बेलें दो अनार, दो नारंगी और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह नरक में नहीं जाएगा।यह हैरत और अफसोस की ही बात है कि जिस देश में, समाज में पेड़-पौधों को पूजने की प्रथा रही है, अब उसी देश में, उसी समाज में पेड़ कम हो रहे हैं। बदलते दौर के साथ लोगों का प्रकृति से रिश्ता टूटने लगा। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए वृक्षों को काटा जा रहा है। नतीजन जंगल खत्म हो रहे हैं। देश में वन क्षेत्रफल 19.2 फीसद है, जो बहुत ही कम है। इससे पर्यावरण के सामने संकट खड़ा हो गया है। घटते वन क्षेत्र को राष्ट्रीय लक्ष्य 33.3 फीसद के स्तर पर लाने के लिए ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाने होंगे। साथ ही खुशनुमा बात यह भी है कि अब जनमानस में पर्यावरण के प्रति जागरूकता आ रही है। लोग अब पेड़-पौधे की अहमियत को समझने लगे हैं। महिलाएं भी इस पुनीत कार्य में बढ़ चढ़कर शिरकत कर रही हैं।बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के गांव मझार कि किरण ने अपने विवाह से पहले एक हजार पौधे लगाए। उन्होंने विवाह की मेहंदी लगाने
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