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संपादकीय-1 ()
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देर से ही सही पर प्रवासी श्रमिकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप रेगिस्तान में पानी का ठिकाना दिख जाने जैसा है। यह वाकई राहत प्रदान करेगा या मृग-मरीचिका साबित होगा, भविष्य ही बताएगा। कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने के लिए पिछले दिनों किए गए देशव्यापी लॉकडाउन के बाद जिन्हें सबसे ज्यादा दुश्वारियों से गुजरना पड़ा, वे प्रवासी मजदूर ही हैं। उनकी दुर्दशा से संबंधित ऐसी दर्दनाक तस्वीरें व घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिन्हें देख-सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का कलेजा मुंह को आ जाए। हम ऐसी तस्वीरों को देख-देखकर दुखी होते रहे हैं। कई समूहों और व्यक्तियों ने घोर मुसीबत में फंसे प्रवासी श्रमिकों की निजी स्तर पर थोड़ी-बहुत सहायता पहुंचाने की कोशिश जरूर की है, पर ऐसे निजी प्रयासों की भी एक सीमा है। ये सांकेतिक तो हो सकते हैं, पर जितने बड़े पैमाने पर मजदूरों को सहायता की दरकार है, उसके सामने ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं कहा जाएगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना और सरकारों को प्रवासी मजदूरों की सहायता के लिए कानूनी तौर पर बाध्य करना निहायत ही जरूरी था। यह इसलिए भी जरूरी था कि धीरे-धीरे हम इस मामले में शासन-प्रशासन की नाकामी को विवशता के रूप में स्वीकार करने लगे थे और मानने लगे थे कि अब कुछ नहीं हो सकता। मजदूरों को त्रासदी झेलनी ही होगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक बार फिर उम्मीद बंधी है। अब देखना है कि सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कितना और किस रूप में पालन कर पाती हैं। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जो अंतरिम आदेश दिए हैं, उसके अनुसार श्रमिकों से किसी तरह का किराया नहीं वसूला जाएगा और रेलवे और राज्य सरकारें उनके लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करेंगी। देश में कोरोना संकट समाप्त नहीं हुआ है। घबराहट में शुरू हुआ मजदूरों का पलायन थम नहीं रहा। बेरोजगारी अपने उच्च स्तर पर है। ऐसे में। तब बेहद दुख होता है जब पक्ष और विपक्ष के राजनेता आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाते हैं। देशहित में उन्हें यह सब छोड़कर एकजुट होना चाहिए और कोरोना महामारी से मुकाबला करना चाहिए। जब से हमारे देश में कोरोना महामारी का आतंक व्याप्त हुआ है और इस पर रोक के लिए सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाया गया है, तब से जिंदगी जीने की सोच में बदलाव आने लगा है। व्यापार के तरीकों में बदलाव देखने को मिल रहा है। माल उधार खरीदेने-बेचने के बजाय नकद बेचने का
देर से ही सही पर प्रवासी श्रमिकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप रेगिस्तान में पानी का ठिकाना दिख जाने जैसा है। यह वाकई राहत प्रदान करेगा या मृग-मरीचिका साबित होगा, भविष्य ही बताएगा। कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने के लिए पिछले दिनों किए गए देशव्यापी लॉकडाउन के बाद जिन्हें सबसे ज्यादा दुश्वारियों से गुजरना पड़ा, वे प्रवासी मजदूर ही हैं। उनकी दुर्दशा से संबंधित ऐसी दर्दनाक तस्वीरें व घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिन्हें देख-सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का कलेजा मुंह को आ जाए। हम ऐसी तस्वीरों को देख-देखकर दुखी होते रहे हैं। कई समूहों और व्यक्तियों ने घोर मुसीबत में फंसे प्रवासी श्रमिकों की निजी स्तर पर थोड़ी-बहुत सहायता पहुंचाने की कोशिश जरूर की है, पर ऐसे निजी प्रयासों की भी एक सीमा है। ये सांकेतिक तो हो सकते हैं, पर जितने बड़े पैमाने पर मजदूरों को सहायता की दरकार है, उसके सामने ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं कहा जाएगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना और सरकारों को प्रवासी मजदूरों की सहायता के लिए कानूनी तौर पर बाध्य करना निहायत ही जरूरी था। यह इसलिए भी जरूरी था कि धीरे-धीरे हम इस मामले में शासन-प्रशासन की नाकामी को विवशता के रूप में स्वीकार करने लगे थे और मानने लगे थे कि अब कुछ नहीं हो सकता। मजदूरों को त्रासदी झेलनी ही होगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक बार फिर उम्मीद बंधी है। अब देखना है कि सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कितना और किस रूप में पालन कर पाती हैं। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जो अंतरिम आदेश दिए हैं, उसके अनुसार श्रमिकों से किसी तरह का किराया नहीं वसूला जाएगा और रेलवे और राज्य सरकारें उनके लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करेंगी। देश में कोरोना संकट समाप्त नहीं हुआ है। घबराहट में शुरू हुआ मजदूरों का पलायन थम नहीं रहा। बेरोजगारी अपने उच्च स्तर पर है। ऐसे में। तब बेहद दुख होता है जब पक्ष और विपक्ष के राजनेता आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाते हैं। देशहित में उन्हें यह सब छोड़कर एकजुट होना चाहिए और कोरोना महामारी से मुकाबला करना चाहिए। जब से हमारे देश में कोरोना महामारी का आतंक व्याप्त हुआ है और इस पर रोक के लिए सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाया गया है, तब से जिंदगी जीने की सोच में बदलाव आने लगा है। व्यापार के तरीकों में बदलाव देखने को मिल रहा है। माल उधार खरीदेने-बेचने के बजाय नकद बेचने का
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